क्यों मनाया जाता है ओणम का त्यौहार ??

 

 ओणम भारत में मनाया जाने वाला एक त्यौहार है जिसे प्रसिद्ध राजा  महाबली  और फसल की कटाई के स्वागत  में मनाया जाता है  |  ऐसा कहा जाता है कि महावली राक्षश जाति से सम्बन्ध रखते थे  पर भव्य गुणों से युक्त थे|  वह गरीबो की सहायता करने वाले और दानवीर राजा थे| लोग उनके  राज्य में बहुत पसन्नता से रहते हैं और समृद्ध जीवन व्यतीत करते हैं| कोई भी व्यक्ति उनके  दरवार से खाली हाथ नही जाता था| एक दिन भगवान विष्णु एक भिखारी का रूप लेकर  महाबली के पास आये ,तब महाबली ने उन्हें मनचाही वस्तु मांगने को कहा | भगवान विष्णु ने कहा मुझे 3 कदम जितनी जमीन चाहिए | ये सुनते ही महाबली हस पड़ा  और वादा कर दिया | जब विष्णु भगवान ने पहला कदम रखा तो आधी धरती उनके अधीन हो गयी दूसरा कदम रखते ही सारी धरती उनके अधीन हो गयी| महावली ये देख कर परेशान हो गए कि वह अपना वादा  अब कैसे पूरा करे तब उन्होंने वादा पूरा करने के लिए अपना सर भगवान विष्णु के कदमो के नीचे रख दिया जो कि भगवान विष्णु का तीसरा कदम था | तब भगवान विष्णु ने उन्हें अपने पैरो से जमीन के नीचे दफनाया था |  इसलिए ये माना जाता है कि वह जमीन में से ओनम के त्यौहार पर आते हैं  अपने राज्य को देखते हैं और लोगो के लिए समृद्धि लाते है इसलिए ये त्यौहार फसल की कटाई के मौसम से भी सम्बधित है|

 

ओणम कब मनाया जाता है|

 

कोलवर्षम , केरल कैलेंडर के अनुसार , ओणम चिंगम महीने में मनाया जाता है जो कि इंग्लिश कैलेंडर में अगस्त सितम्बर के बीच में आता है | यह चिंगम का महीना होता है |
इस वर्ष यह त्यौहार 14 सितम्बर 2016 को आ रहा है|

 

कैसे की जाती है ओणम की तैयारियां ?

 

ओणम का त्यौहार 10 दिन तक मनाया जाता है जिसमे कई प्रकार की गतिविधियां होती हैं|  यहाँ हम पहले से दसवे दिन तक का उल्लेख कर रहे हैं|

 

सबसे पहले दिन प्रवेश द्वार पर महाबली के स्वागत के लिए पीले फूलो का प्रयोग करके , जिन्हें फूलकमल कहते हैं , रंगोली की रचना की जाती है |

 

दूसरे दिन घर की सफाई की जाती है  और पूलकमल रंगोली  में फूलो की दूसरी परत चढ़ाई  जाती है |

 

तीसरे दिन एक और परत पूलकमल रंगोली पर चढ़ाई जाती है और इस दिन समारोह के लिए खरीददारी करते हैं |

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चौथे दिन अनेक प्रकार के खेल और परंपरागत प्रतियोगिताओ की व्यवस्था की जाती है और लोग उन में  काफी हर्षोल्लाष से भाग लेते हैं|

 

पांचवा दिन विशेष रूप से वल्लमकाली के लिए है जिसका मतलब ड्रैगन बोट रेस है | लोग बड़ी बड़ी किस्तियो में इस रेस में हिस्सा लेते है जो कि इस रेस का मुख्य आकर्षण का केंद्र है |

 

छठे दिन के बाद समारोह के लिए सारे स्कूल और दफ्तर बन्द रहते हैं | लोग पूरी तरह से त्यौहार में सम्मिलित होते हैं|

 

सातवे दिन पूरे राज्य को सजाया जाता है और परंपरागत लोग नृत्य हर तरफ देखने को मिलते हैं|

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आठमें  दिन वामन की मूर्तियों और  महाबली की मूर्तियों को स्नान करा कर पूलकमल रंगोली  के बीच में स्थापित किया जाता है|

 

नोवें दिन विशेष प्रकार के 11  तरह के पकवान घर पर तैयार किये जाते हैं |  इन्हें परम्परागत तरीको से तैयार किया जाता है और फिर केले के पत्तो पर रख कर परोसा जाता है|

 

अंतिम दिन लोग सबसे पहले स्नान करके नए कपड़े पहन कर भगवान विष्णु के मन्दिर जाकर प्रार्थना करते हैं | इस दिन कई तरह के नृत्य आयोजित किये जाते हैं  और विभिन्न प्रकार की खेलो का आयोजन किया जाता है |

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ओनसद्या क्या है ?

 

ओनसद्या ओणम नाम के त्यौहार का एक महहत्वपूर्ण हिस्सा है | यह एक विशेष प्रकार का खाद्य पदार्थ है जो विभिन्न प्रकार के व्यंजनों और परम्परागत वस्तुओं को शामिल करके बनाया जाता है|  इस  त्यौहार में 11 तरह के विशेष पकवान तैयार किये जाते हैं जिन्हें केले  के पत्तो पर रखकर परोसा जाता है और इन्हें हाथो से ग्रहण किया जाता है क्योकि चमच्च और कांटे के इस्तेमाल की अनुमति नही होती | इनका इस्तेमाल परम्परा के खिलाफ है|

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 वल्लमकाली  स्नेक ( snake )  बोट  रेस  क्या है?

 

वल्लमकाली एक  स्नेक (snake ) बोट  रेस है जिसका आयोजन ओणम त्यौहार के समारोह में होता है | नदी के किनारे रहने वाले गाँव के लोग इस दौड़ में भाग लेते हैं| इन नाव को देवता माना जाता है और केवल पुरुषो को इसे नंगे पैरो से स्पर्श करने की अनुमति होती है|  यह लगभग 100 फ़ीट की होती है और हर नाव का मुख कोबरा सांप की तरह होता है| नाव को विभिन्न प्रकार की चीजो से सजाया जाता है|  बहुत सारे लोग वल्लमकाली  स्नेक  बोट  रेस देखने आते हैं | वल्लमकाली  स्नेक  बोट  रेस के नियमो के अनुसार एक नाव में 150 लोग होते हैं जिनमे 25 परम्परागत गानों  के गायक होते होते हैं|

 

ओणम के त्यौहार की मुख्य प्रथाये और रीति रिवाज

 

मावेली  पूजा

मावेली  पूजा  का आयोजन नोंवे और दसवे दिन किया जाता है| 3 मूर्तियां लाल मिट्टी की बनाई जाती है और उन्हें घर के  गलियारे में स्थापित किया जाता है| घर के लिए कमाने वाला व्यक्ति सुबह जल्दी उठकर उन मूर्तियों के आगे प्रार्थना करता है |

 

थ्रिपुनितुरा  अथाचमयं

केरल  के जिले एमकुलं में बड़े पैमाने पर इस जुलुस का आयोजन किया जाता है| इस जुलुस में बहुत से हाथी भाग लेते हैं| इन हाथियों को बिल्कुल उस तरह सजाया जाता है जैसे राजा की सवारी को सजाया जाता है|

 

ओनाठल्लू

ओनाठल्लू एक विशेष प्रकार का खेल है जिसमे पुरुष लघु धोती पहंनते हैं और बिना किसी शस्त्र के , सिर्फ हाथो के प्रयोग से लड़ाई करते हैं| यह खेल और बहुत सारी जगह आयोजित किया जाता है| और बहुत सारे लोगो द्वारा देखा जाता है| इस परम्परा का अभ्यास बहुत पुराने समय से किया जाता है|

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